जाति, जाति में जाति है

जाति जाति में जाति है : सुनील मानव

यहाँ बात तो मैं ‘जाति’ की करने जा रहा हूँ लेकिन उससे पहले अपने जिस गाँव ‘जगतियापुर’ के संदर्भ में यह प्रसंग छेड़ रहा हूँ उसकी साक्षरता और सामाजिक बुनावट पर पर भी संक्षिप्त रूप में प्रकाश डालना चाहता हूँ । 

मेरा गाँव जगतपुर । अपने अपभ्रंष ‘जगतियापुर’ के नाम से कहीं अधिक पहचाना जाता है जो कि उसके पिछड़ेपन का भी सूचक रहा है । पिछड़ापन पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति का । किसी व्यक्ति पर यह नियम जितनी मज़बूती से लागू होता है, व्यक्तियों के समूह अर्थात ‘गाँव’ पर भी उतनी ही मज़बूती से लागू हो जाता है । तो इस बात को समझने के लिए सबसे पहले इस ‘जगतियापुर’ की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक स्थिति पर एक दृष्टि डालनी होगी । 

सबसे पहले मैं पूरे गाँव को तीन प्रमुख भागो में बाँट रहा हूँ और यह तीन वर्ग हैं – ‘ब्राह्मण परिवार’, ‘दलित परिवार’ और ‘अन्य सभी परिवार’ । पाँच वर्ष तक के बच्चों को छोड़कर पूरे गाँव की जनसंख्या होती है करीब 1100 से 1200 के आस-पास । इसको अब इन वर्गों के आधार पर देखते हैं । 

01. ब्राह्मण वर्ग – इसमें मात्र दो परिवार हैं, जिनकी कुल जनसंख्या है 45 व्यक्ति । इनमें से 25 व्यक्ति स्नातक या उससे कहीं अधिक पढ़े हैं और इनमें से 10 लोग ऐसे हैं जो सरकारी या प्राइवेट नौकरी अथवा व्यापार कर रहे हैं । साक्षर करीब-करीब सभी हैं । 

02. दलित वर्ग – इसमें दो जातियाँ हमारे गाँव में रहती हैं । ‘जाटव’ तथा ‘वाल्मीकि’ । जाटवों के कुल 30 तथा वाल्मीकि के कुल 04 परिवार मिलाकर जनसंख्या होती है 195 लोगों के आस-पास । इनमें से करीब 23 लोग स्नातक या उससे ऊपर तक शिक्षित हैं । 04 लोग सरकारी या गैर-सरकारी रूप से नौकरी मे हैं । तमाम संघर्षरत भी । साक्षरता की दर इस वर्ग में 50 प्रतिशत के आस-पास । 

03. अन्य वर्ग – इसमें ‘क्षत्रिय’, ‘कुम्हार’, ‘लोहार’, ‘शिल्पकार’, ‘धोबी’, ‘तेली’, ‘नाई’, ‘गोसाईं’, ‘भुर्जी’ और ‘आरख’ मिलाकर कुल 10 जातियाँ आती हैं । इन सबको मिलाकर इनकी जनसंख्या होती है 800 से ऊपर । इस पूरे वर्ग की कुल आठ या साढ़े आठ सौ की जनसंख्या में कुल स्नातक हैं 07 या 08 । इनमें भी केवल एक लड़का ठीक-ठाक नौकरी करता है बाहर । साक्षरता की दर इस वर्ग में अधिक से अधिक 15 से 20 प्रतिशत के आस-पास । 

अब आते हैं मुख्य बात पर । ब्राह्मण वर्ग स्वयं को पूरे गाँव से करीब-करीब अलग रखता है । कुछ अहंबोध के चलते । यह ‘अहंबोध’ सांतीय होने के साथ-साथ कुछ पढ़ाई-लिखाई का और कुछ उच्च कुलीनता का है । दूसरा वर्ग ‘दलित समुदाय’ भी अपने मोहल्ले तक ही करीब-करीब सीमित रहता है । इसका कारण गाँव के लोगों में उनके लिए असामाजिक तथा हीनताबोध का होना है । शेष अन्य वर्ग आपस में मिला-जुला रहता है । ‘मिला-जुला’ का तात्पर्य आप आपसी प्रेम और भाईचारे से बिलकुल ही न निकालें । जब भी किसी को मौका मिलता है, सामने वाले को फ़ँसाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता है । खैर ! 

अब मैं अपनी बात के मुख्य हिस्से पर आते हुए गाँव के मुख्य तीन लोगों पर बात करता हूँ जो इस आलेख के आलंबन हैं । 

एक – पं. रामदुलारे शुक्ला ।
दो – ठाकुर प्यारे सिंह राठौर एवं ठाकुर दर्शन सिंह राठौर ।
तीन – जगदीश गौतम । 

पं. रामदुलारे शुक्ला की पत्नी कुछ मानसिक रूप से कमजोर निकली और गाँव-गिराँव के लोग तो रामदुलारे तक को कुछ मानसिक कमजोर मानते हैं जो कि मुझे कभी न लगा । खैर इनकी पत्नी घर से चली गई और पीलीभीत स्टेशन के आस-पास रहकर ‘भीख’ माँगने लगी । रामदुलारे के पास अपने जीवन यापन भर को पर्याप्त जमीन भी है । मेहनत खूब कर लेते हैं । बस सामाजिक रहन-सहन से दरिद्र हैं । ब्राह्मण होने के बावजूद भी गाँव का कोई भी व्यक्ति इनसे संबंध नहीं रखता है ।
ठाकुर प्यारे सिंह राठौर एवं ठाकुर दर्शन सिंह राठौर भजनसिंह के दो पुत्र हैं । गाँव में सबसे कुलीन क्षत्रिय । भजनसिंह बारात न होने पर अपने लिए बाहर से (लोगों के कहे अनुसार) बीबी मोल ले आए थे । बाद में पुत्रों का भी जब ब्याह न हुआ तो उनके लिए भी बाहर से ही एक औरत लाकर प्यारे सिंह की बीबी बनाई गई । थोड़ी-बहुत ज़मीन भी रही । घर भी ठीक-ठाक ही है । बावजूद इसके कोई भी व्यक्ति इनके यहाँ उठने-बैठने और खाने-पीने में संकोच करता है । 

जगदीश गौतम दलित जाति से हैं । इनके पिता जी रेलवे में थे । तीन भाई हैं । तीनों पढ़े-लिखे । जगदीश तो एडवोकेट होने के साथ-साथ गाँव के स्कूल में शिक्षामित्र भी हैं । इसके अतिरिक्त गाँव के राशन की सरकारी दुकान भी काफ़ी समय तक उनके छोटे भाई ‘सत्यप्रकाश’, जो इस समय भारतीय रेलवे में कार्यरत हैं, के पास रही । खेती-पाती भी पर्याप्त है और राजनैतिक जान-पहचान भी अच्छी-खासी है । गाँव के अधिकांश लोगों के पास यह नि:संकोच बैठते हैं और लोग इनके यहाँ चाय-पानी पीने में कोई परहेज नहीं करते हैं ।
अब देखने की बात यह है कि यदि इस गाँव में ब्राह्मण परिवार को निकाल दिया जाए तो दलित वर्ग सर्वाधिक संघर्षशील रहा है । ब्राह्मणों को आनुवांशिक रूप से ही पढ़ाई-लिखाई का ‘अहंबोध’ प्राप्त हुआ है लेकिन दलित लोगों ने अपनी स्थिति बदलने के लिए वास्तव में पढ़ई-लिखाई को अपना सहारा बनाया और तरक्की भी कर रहे हैं । तीसरा जो अन्य वर्ग है, उसमें इस प्रकार का कोई संघर्ष नहीं देखा जा सकता है । कुछ अपवादों को छोड़ दें तो । 

अब बात यह कि जो पहले दो उदाहरण हैं, पं. रामदुलारे शुक्ला और ठाकुर भजन सिंह राठौर का परिवार उन्हें समाज में समानता नहीं प्राप्त है । इसका एकमात्र कारण उनका आर्थिक रूप से अन्यों की अपेक्षा कहीं अधिक दरिद्र होना और घर-परिवार द्वारा सामाजिक बंधनों को तोड़कर आगे बढ़ना है । ये जो मैं ‘सामाजिक बंधनों को तोड़ने की बात’ कह रहा हूँ वह यह कि एक जो क्षत्रिय परिवार है उसमें असामाजिक रूप से ब्याही गई स्त्री आई और दूसरे जो पं. रामदुलारे हैं उनकी पत्नी घर से जाकर बाहर भीख माँगने लगी । बस इसी कारण गाँव के लोगों ने इनका करीब-करीब अघोषित रूप से सामाजिक बहिस्कार कर रखा है । 

दलित बस्ती में जगदीश की अपेक्षा कोई अन्य आर्थिक रूप से उतना संपन्न नहीं है । जगदीश आर्थिक रूप से संपन्न भी हैं और राजनैतिक रसूख भी रखते हैं । तो गाँव के अधिकांश सवर्ण या वह सभी जातियाँ जो अन्य ‘जाटव’ या ‘वाल्मीकि’ परिवारों से स्वयं को जाति के स्तर पर श्रेष्ठ तथा अपनी कुलीनता के अहंबोध के साथ जी रही हैं, वह इन जाति के अन्य लोगों, अर्थात जगदीश को छोड़कर किसी को अपने बराबर नही समझतीं । देखा तो यहाँ तक जा सकता है कि जगदीश के यहाँ बैठकर, उनसे आर्थिक मदद लेकर, चाय-पानी पीकर जब लोग गाँव में घूमते हैं तो उन्हें जातिसूचक गालियाँ ही कहीं अधिक देते हैं लेकिन सामने व्यवहार समानता का होता है । जगदीश की इज्जत महज इसलिए है कि उसकी आर्थिक स्थिति अन्यों की अपेक्षा काफ़ी ठीक है । 

तो इस प्रकार हमारे पूरे गाँव में कुल तेरह जातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें सवर्ण-अवर्ण सभी सम्मिलित हैं लेकिन ‘प्रक्टिकल’ रूप में केवल ही जातियाँ देखी जा सकती हैं । एक वह जो पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति से संपन्न हैं तथा दूसरे वह जो इनसे संपन्न नही हैं । 

दलित होते हुए भी जगदीश के साथ जातिगत दुरूहता लोगों में केवल इसलिए नही है कि उनके पास यह पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति है लेकिन पं. रामदुलारे और ठा. भजन सिंह राठौर का सामाजिक सम्मान बस इसलिए नहीं है क्योंकि उनके पास यह पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति नहीं है । 
वास्तविक जाति केवल आर्थिक रूप से ही निर्धारित होती है । सामाजिक समानता या असमानता का मूल यह ‘अर्थ’ ही है । बड़ा नेता या अफ़सर किसी भी जाति का क्यों न हो, उसके सामने सब झुकते हैं लेकिन बड़ी जाति का होने के बावजूद वह आर्थिक रूप से विपन्न है तो उसकी स्थिति ‘दलित’ सी हो जाती है । 

समाज के इस बँटबारे को आर्थिक रूप से ही समझा जा सकता है । बाकी ये जाति, धर्म आदि सब पूँजीपतियों के छलावे मात्र हैं । इसे गहराई से समझने की आवश्यकता है । लेकिन यह ‘गहराई से समझने’ की समझ तो एक ही तरह से आ सकती है । वह है शिक्षा । शिक्षा ! इसकी स्थिति तो हमारे देश में वेश्याओं जैसे है । जो जैसा मोल लगाए, वैसी ही खरीद ले । ... और सार्वजनिक शिक्षा की स्थिति ... उसका तो पूछिए ही क्या ...
ऊपर जो इस गाँव की साक्षरता की स्थिति देखी है, वह सब व्यक्तिगत रूप से प्राप्त की हुई शिक्षा ही है । शायद ही हमारे गाँव के 1200 की जनसंख्या के कुल स्नातक 55 लोग इन सरकारी स्कूलों से शिक्षित हुए हों । हों भी कैसे ? जरा एक नज़र इधर भी डाल लीजिए । 

हमारे गाँव में दो स्कूल हैं । प्राथमिक और पूर्व-माध्यमिक । यानि कि कक्षा एक से लेकर आठ तक गाँव में ही शिक्षा मिल सकती है । प्राथमिक स्कूल में पिछले करीब एक साल से कोई ‘मास्टर’ नहीं है । दूसरे  गाँव के प्रधानाचार्य को ही ‘चार्ज’ मिला हुआ है जो कि शायद ही कभी हमारे गाँव के इस स्कूल को देखने भी आया हो । इसके अलावा यह पूरा स्कूल चल रहा है दो शिक्षामित्रों के सहारे । इसको अधिक व्याख्यायित करने की आवश्यकता ही नहीं है । 

दूसरा स्कूल है पूर्व-माधमिक । इसमें कुल दो ‘मास्टर’ हैं । एक ‘प्रधानाचार्य’ कहलाता है और दूसरा ‘सह अध्यापक’ । यहाँ तीन कक्षाएँ चलती हैं । 

कुल मिलाकर इन स्कूलों में जो बच्चे जाते हैं वह केवल दोपहर में खाने के लिए । इसका जिम्मेदार गाँव का प्रत्येक अभिभावक भी है । सरकार तो चाहती ही नहीं है कि गाँवों में शिक्षा का स्तर विकसित हो लेकिन अभिभावक भी नहीं चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़ें । जो शिक्षा के महत्त्व को समझ ले रहे हैं, वह ‘जाति’ की ‘इस राजनीति’ को भी समझ पा रहे हैं । 

यहाँ पर एक बात और स्पष्ट की जानी ही चाहिए कि जन-सामान्य में शिक्षा के प्रति समझ कहूँ या सामाजिक समझ कहूँ तब उत्पन्न होगी जब उनकी सामान्य आवश्यकताएँ पूरी होंगी । तो मनुष्य की सबसे पहली जरूरत है पेट भरने की । जब पेट भरेगा तो वह तन और सर ढकने के बारे में सोचेगा । ... और जब यह रोटी, कपड़ा और मकान की आवश्यकताएँ पूरी हो जायेंगी तब वह समाज के बारे में, समाज में अपनी स्थिति के बारे में, स्वयं पर हो रहे शोषण के बारे में सोचना आरम्भ करेगा ।
ऊपर जो तीन उदाहरण दिए गए हैं उनमें से प्रथम दो उदाहरण ‘आर्थिक विपन्नता का प्रतिनिधित्त्व’ करते हैं और अंतिम तीसरा उदाहरण उस ‘आर्थिक विपन्नता से ऊपर पहुँच चुके वर्ग का प्रतिनिधित्त्व’ करता है, जो अब रोटी, कपड़ा और मकान से ऊपर सोचना आरम्भ कर चुका है ।  जब तक यह प्रथम वर्ग अपनी मूल आवश्यकताओं को पूरी करके ऊपर नहीं उठेगा तब तक वह कुछ सोच नहीं पाएगा । और जब सोच नहीं पाएगा तो इसी तरह समाज में ‘अछूत’ बना रहेगा । पूँजीपतियों के हाथ की कठपुतली बनकर ‘जाति’ के छलावे में पड़ा रहेगा । 

निष्कर्ष : यह कि “पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति से युक्त ‘दलित कहा जाने वाला व्यक्ति’ भी ‘ब्राह्मणत्त्व’ को प्राप्त हो जाता है और इसी पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति से विपन्न ‘ब्राह्मण (सवर्ण) कहा जाने वाला व्यक्ति’ भी ‘दलित्त्व’ को प्राप्त हो जाता है ।”

स्पष्टीकरण : 
दलित = शूद्र कही जाने वाली जातियाँ बनाम आर्थिक विपन्न लोग ।
ब्राह्मण = समाज की उच्च्य वर्णीय जातियाँ बनाम आर्गित्क संपन्न लोग । 

“अब आज की वास्तविक लड़ाई इसी संपन्नता और विपन्नता अर्थात इसी सवर्ण और अवर्ण के बीच की है, जिसे समझने की आवश्यकता है । कम से कम मैं इन्हें कर्म अथवा धर्म प्रेरित जाति नहीं मान सकता हूँ । वर्तमान में जिसे हम ‘जाति’ अथवा ‘धर्म’ कहते हैं वह न तो कर्म से प्रेरित है और न ही धर्म से प्रेरित है । वह तो केवल और केवल आर्थिक समानता और असमानता से सिंचित और संचालित है । बस राजनैतिक व्यापार को चलाने के लिए इसका भरपूर प्रयोग होता है और ‘जनता’ कहे जाने वाले लोग अज्ञानताबस इसको खाद-पानी दे रहे हैं ।”

सुनील मानव
जगतपुर (पीलीभीत)
20.05.2020

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