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मरिहइं नाइं इत्ती जल्दी...

मरिहइं नाइं इत्ती जल्दी... Ø सुनील मानव त म्बाकू पी जा चुकी थी , चिलम में अब केवल राख थी। बावजूद इसके हरिहर स्मृतियों में खोये हुए एक लम्बा सुट्टा लगाते तो एक-आध चिनगी मुस्कुरा ही पड़ती थी। अपने बरोठे में एकचित हुए बैठे अधेड़ हरिहर की निगाहें सामने नहर के बाजू में पसरी सड़क से मानों किसी बात पर जिरह सी करती प्रतीत हो रही थीं। सड़क थी कि अपने गड्डों से आने-जाने वालों को बचाती या बचने का मूक इशारा करती हुई हरिहर से मुंह चिढ़ा रही थी। अभी दो साल पहले ही एम.एल.ए. के चुनाव से ठीक महीने भर पहले ही इस सड़क पर रमेसुर ठेकेदार ने पत्त्थर डलबाकर कोलतार पुतवाया था, सो चुनाव होते ही प्रत्याशियों के साथ सिमटा चला गया और सड़क थी कि वहीं अपने पुराने आवरण में बिछी रह गई थी। समझ ही नहीं आ रहा था कि इस बहस में हरिहर के चेहरे पर विजयचिन्ह थे या इस सड़क पर। यह रोज का ही काम बन गया था कि जब भी हरिहर थोड़ी-बहुत फुरसत में होते तो बरोठे में चुपचाप बैठकर सामने पसरी पड़ी सड़क को निहारते रहते थे। जब से थर्मल पावर के लिए उनकी जमीन चली गई तब से उनकी दिनचर्या बदल गई थी। नहीं तो पहले हरिहर को खेत-खलिहान से...

वाम का चरित्र बनाम चरित्र का वाम

यह आलेख मेरे बाबा का है जो कथा प्रतिमान पत्रिका में छद्म नाम से छपा था..............                                                                 वाम का चरित्र बनाम चरित्र का वाम आचार्य भिक्खुमोग्गलायन शी तल प्रसाद इस छोटी सी बात को मोटी तौर पर मान कर चलता है कि लेखन और प्रतिबद्ध, ये दोनों ही शब्द हिन्दी के लेखक और पाठक(!) के परिचित शब्द हैं। यह बात दूसरी है कि लेखक अपने ‘लेखक’ की गरिमा को बनाए रखने के लिए पाठक से एक समानान्तर दूरी बनाए रखता है। उसे उसकी समझ पर भी बराबर सन्देह बना रहता है और समानान्तर रेखाओं के बाल सुलभ उदाहरण ‘रेल की पटरी’ की तरह लेखक और पाठक सुदूर लक्ष्य तक कभी और कभी नहीं मिल पाते। अपनी समझ पर कुछ गंभीर टाइप का विश्वास करके वह कभी-कभी तो ऐसी सूक्तियां उछाल देता है कि पाठक दोनों हाथ ऊपर उठाये आकाश को ताकता रह जाता है और सूक्ति है कि शून्य में झूलती रहती है। उदाहरण के लिए एक वाम पक्षधर लेखक ने एक सूक...

पूर्वोत्तर भारत का एक राज्य ‘त्रिपुरा’

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      सुनील ‘मानव’ पू र्वोत्तर प्रदेश का जिक्र आते ही हमारे मनोमस्तिष्क में वहाँ की ऊँची-नीची पहाड़ी भूमि जो सघन जंगलों से आक्षादित है तैरने लगती है। साथ ही मन में उठने लगती हैं ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों की मन को मोह लेने वाली उत्ताल तरंगें। इस प्रदेश में जहाँ एक ओर सिक्किम की बर्फ से ढकी और सैलानियों के साथ हँसती-खिलखिलाती सूर्य की लालिमा से चमकती हुई पहाड़ियां हैं तो दूसरी ओर असम का कामाख्या मंदिर और रिमझिम बारिश से मन को मोहने वाले प्रदेश। ऐसा ही मन को मोहने वाला एक छोटा राज्य है त्रिपुरा, जहाँ का इतिहास और भौगोलिक वातावरण उसे कई मायनों में महत्त्वपूर्ण बनाता है। प्रथमत: बात की जाए इस राज्य के नाम ‘त्रिपुरा’ की, जिसकी जड़े तलाशते हुए विद्वान तमाम अटकलें लगाते रहे हैं। तमाम जनश्रुतियां प्रचलित हैं इस नाम को लेकर। कोई इस नाम को बर्बर राजा ‘त्रिपुर’ से जोड़ता है तो कोई इसे ‘शिव/त्रिपुरारी’ से संबद्ध करके देखता है। आगे तो विद्वानों ने शिव-पत्नी ‘त्रिपुर-सुंदरी’ अथवा ‘त्रिपुरेश्वरी’ से इस नाम का संबंध दिखाया। कुछ विद्वानों ने इसको तिब्बती-बर्मी और ची...