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भंवरा बड़ा नादान हो ...

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भंवरा एक छोटा लेकिन शक्तिशाली कीट है, जिसकी पहचान उसकी काली-पीली धारियों से की जाती है। यह मधुमक्खी की तरह दिखता है, परंतु इसका स्वभाव अलग है। भंवरे की सबसे बड़ी आदत फूलों का रस चूसना है, जिससे यह पौधों के परागण में मदद करता है। यह दिन में सक्रिय होता है और मीठी खुशबू की ओर आकर्षित होता है। अपनी पंखों की तेज़ी से कंपन करने की क्षमता से यह लंबी दूरी तक उड़ने में सक्षम होता है। भंवरे प्राय: छोटे समूहों में रहते हैं और ज़्यादातर फूलों के इर्द-गिर्द अपना समय बिताते हैं। इनके घोंसले जमीन के नीचे या पेड़ों में होते हैं। भंवरे अपने मधुर गीतों से वातावरण में संगीतमय ध्वनि पैदा करते हैं। हिंदी साहित्य में भंवरा एक महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसे प्रेम, वफादारी, और स्वच्छंदता का प्रतीक माना जाता है। भंवरे की तुलना अक्सर प्रेमी से की जाती है, जो अपनी प्रिय की ओर आकर्षित होता है। प्रसिद्ध कवि कालिदास से लेकर आधुनिक कवियों तक भंवरे का उल्लेख ...

काकड़ीघाट : पर्वतों की गोद में रचनात्मकता और आत्मीयता की यात्रा

उत्तराखंड के सुरम्य पहाड़ों के बीच, अल्मोड़ा जिले की सीमाओं पर स्थित एक छोटा सा गाँव काकड़ीघाट । यहाँ की शांत वादियों और प्रवाहित नदियों के साथ स्वामी विवेकानंद का ध्यान स्थल, मानो इस जगह को एक आध्यात्मिक शक्ति से जोड़ता है । स्थानीय लोगों का मानना है कि विवेकानंद जी ने इस स्थान पर आकार कुछ समय ध्यान किया था । इस आस्था के चलते दूर-दूर से उनके अनुयायी विवेकानंद जी के एहसास को महसूस करने भी यहाँ आते हैं । तो इसी काकड़ीघाट में हमने एक अनोखी यात्रा का अनुभव किया । यह यात्रा केवल स्थल भ्रमण नहीं थी, बल्कि रचनात्मकता, आत्मीयता और शिक्षा के क्षेत्र में नवीन दृष्टिकोण को बल देने का प्रयास भी थी । हम कुछ मित्रों – रविपाल, राजकुमार, सैफ असलम, विकास, मोहित और मैं – ने इस यात्रा का प्लान किया और हमारे आमंत्रण पर मित्र महेश पुनेठा जी भी पिथौरागढ़ से काँकड़ी आकार हमारी यात्रा के साथी बने । यहाँ तक कि हमारे अनुरोध पर उन्होंने ही इस यात्रा का नेतृत्व भी किया । आपकी उपस्थिति ने हमारे बीच अनेकानेक विषयों को सार्थक चर्चाओं का माध्यम बनाया । आपकी ‘झोला पुस्तकालय’ की पहल ने हम सबको बहुत प्रभावित किया । उनकी ...

मेरे गांव जगतियापुर की खूबसूरत सुबह और फोटोग्राफी

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उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में स्थित मेरा गांव, जगतियापुर, अपनी सादगी और प्राकृतिक सुंदरता के लिए मुझे हमेशा से आकर्षित करता है। यहां की ताज़ी और सजीव सुबहें, खेतों में फैली हरियाली, और चारों ओर फैली शांति मन को मोह लेती हैं। जैसे ही मैं अपने गांव में कदम रखता हूँ, गाँव की एक नई सुबह अपने रंग-बिरंगे दृश्य लेकर मेरे सामने प्रस्तुत होती है। गाँव में सुबह का अनुभव शहरी जीवन से पूरी तरह भिन्न है। सूरज की पहली किरण जब धरती को स्पर्श करती है, तो ऐसा लगता है मानो धरा ने स्वर्ण का चादर ओढ़ लिया हो। हल्की ठंडी हवाओं के साथ पक्षियों की चहचहाहट एक स्वाभाविक संगीत प्रस्तुत करती है। दूर-दूर तक फैले खेत, जिनमें हरे-भरे पौधे और सजीव फसलें लहलहाती हैं, सुबह की नमी में चमक उठती हैं। बरसात के मौसम में गाँव की सूरत और भी सुंदर हो जाती है। मैं अपने कैमरे के साथ खेतों में जाता हूँ, जहाँ चारों तरफ धान, गन्ना, और उरद की फसलें लहरा रही हैं। बरसात के महीनों में फसलों की हरियाली देखने लायक होती है। धान के पौधे अपनी हल्की हवा में झूमते हुए ऐसा प्रतीत होते हैं जैसे प्रकृति ने इन्हें नृत्य का आदेश दिया हो। गन्न...

अहिच्छत्र : इतिहास की छत पर वर्तमान की चहलकदमी

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अहिच्छत्र की यात्रा का अनुभव मेरे जीवन की उन स्मृतियों में से एक है, जो इतिहास की परतों को छूने का अवसर प्रदान करता है। बरेली के आंवला स्टेशन से उत्तर दिशा में कोई 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह स्थल, सदियों पुराने वैभव, ऐश्वर्य और उल्लास की कहानियां सुनाता है। जब मैं वहां पहुंचा, तो पहले पहल जो दृष्टिगोचर हुआ, वह थे खंडहरों के अवशेष—मानो एक युग जो अब इतिहास की किताबों तक सिमट चुका है, अपनी कहानी कहने को व्याकुल हो। अहिच्छत्र, जो महाभारतकालीन पांचाल राज्य की राजधानी था, का नाम सुनते ही मस्तिष्क में द्रौपदी का चित्र उभर आता है। मान्यता है कि द्रौपदी यहीं पैदा हुई थीं, और इसी भूमि ने उनके गौरवशाली जीवन का आरंभ देखा। यहां के किले, जो आज जर्जर स्थिति में हैं, कभी महाभारत के नायकों के कदमों की गवाह रहे होंगे। मुझे बताया गया कि यह किला पांडवकालीन किला कहलाता है, क्योंकि कौरवों और पांडवों का यहां अधिकार था। जैन अनुयायियों के लिए अहिच्छत्र विशेष महत्व रखता है। यहां 23वें जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। अहिच्छत्र का यह पहलू मेरे लिए एक नया और अद्वितीय अन...

चुप्पियों में खोते संवाद : माती की स्मृतियों से जूझता मन

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एक अजीब सी संवादहीनता बढ़ती जा रही है – घर में, परिवार में, गाँव में, समाज में ... और सबसे अधिक खुद में ... कहीं हुईं सामूहिक मौतों से उत्पन्न भयाक्रांत सन्नाटे–सी । यह शून्यता वर्षों पहले गांव में आई एक महामारी के समय महसूस हुई थी । आज हर एक जगह वही दिखती है । बेहद कोलाहल पूर्ण वातावरण में अवसाद-सी । कबीर पागल था । खाने और सोने वाली दुनिया को सुखिया कह गया । उसने रोने और जागने को खुद के लिए चुना । चुप्पियों ने यहीं से उभरना शुरू किया था ।    आज गोरू घर नहीं लौट रहे हैं । बचे ही नहीं । मुझे मेरे नाना याद आते हैं । सौ-एक जानवरों के पीछे, कंधे पर लाठी, शरीर पर उमंग मिश्रित श्रमबिन्दु और मुँह से झरता संवादों का सैलाब लेकर नदिया से शाम को वापस घर आ रहे हैं । मैं आज भी इस बिंब को दूर खड़ा निहार रहा हूँ ।  आसमान में एकाध पखेरू भर हैं वापस जाने भर को । वापस आने के लिए इंतजार का कोई आलंबन भी तो होना चाहिए । सब कुछ शांत है । सही कहा ‘लौटना मुश्किल होता है ।’ अंधेरा धीरे-धीरे घिर रहा है । वैसे तो बिलकुल नहीं जैसे निराला की ‘संध्या सुंदरी’ ‘परी सी उतरती थी धीरे धीरे धीरे ।’ यह एक भय ह...

खाऊंगा तो हाथी ही

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एक बार की बात है । शब्द थे अपनी दादी के पास... और दादी बना रही थीं पूड़ी ।  बुआ ने एक पूड़ी शब्द की ओर बढ़ाई और बोलीं – खाओ...   शब्द : मैं नहीं खाऊँगा... बुआ : क्यों नहीं खाओगे...  शब्द : मुझे भूख नहीं लगी है...  बुआ : अच्छा चिड़िया बना देती हूँ... खाओगे...  शब्द : चिड़िया क्या खाई जाती है...  बुआ : सचमुच की थोड़े न... आटे की...  शब्द : आटे की क्या कोई चिड़िया होती है...   बुआ : हाँ... होती है... खाने वाली होती है...  शब्द : तो क्या हाथी भी होता है खाने वाला... बुआ : हाथी भी होता है खाने वाला...  शब्द : तो हाथी बना दो... वो खाऊँगा...  बुआ : हाथी मैं नहीं बना पाती हूँ...  शब्द : तो चिड़िया कैसे बना लेती हो...  बुआ : चिड़िया बना लेती हूँ...  शब्द : तो हाथी तो बनाना ही पड़ेगा... वरना कुछ नहीं खाऊँगा...  अब बुआ से लेकर दादी, मम्मी सब पड़ गए चक्कर में । शब्द ने ठान ली जिद । खाऊँगा तो हाथी ही खाऊँगा ।    सबने कोशिश की बनाने की लेकिन बना नहीं पा रहा था कोई भी ।   किसी से पूछ नहीं बनती तो किसी से...

भूख लगी हम चब्बइं का

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शब्द जैसे-जैसे बड़े होते जा रहे हैं, उन्हें कहानियाँ सुनने की लत-सी लगने लगी है । मम्मा-पापा तो कभी-कभी इस बात पर डाँट तक देते हैं । फिर क्या – बैठ जाते हैं मुँह फुलाकर ।  इस बार सर्दियों की छुट्टी में जब गाँव गए तो पकड़ लिया दादी को । ...और दादी के पास तो मानो कहानियों का खजाना ही है । शब्द की तो जैसे लाटरी ही लग गई ।  शाम हुई नहीं कि शब्द जा घुसे दादी की रजाई में । एक मीठा चुम्मा इधर से... एक मीठा चुम्मा उधर से... बस यही बहुत होता कहानी सुनने के लिए...  आज दादी के पिटारे से एक चिड़िया की कहानी निकल पड़ी ।  दादी ने कहानी सुनानी शुरू की -     ‘बात है बहुत पुरानी...   शब्द : कितनी पुरानी ?  शब्द के प्रश्न तो मानो शांत बैठ ही नहीं सकते हैं ।  दादी झल्ला पड़ीं – हमें नहीं पता... सीधे-साधे कहानी सुननी हो तो सुनो... नहीं तो हम नहीं सुना पाएंगे... हाँ नहीं तो क्या...  शब्द : अच्छा-अच्छा सुनाओ-सुनाओ...  दादी : तो बात है बहुत पुरानी । एक थी चिड़िया । नाम था उसका चिर्रु...  एक दिन की बात है । चिर्रु कहीं से एक दाना लेकर ...

ये पेंटिंग कौन बनाता है पापा

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एक दिन की बात है । शब्द अपने मम्मा-पापा के साथ बाइक से अपने बाबा के पास जा रहे थे । शब्द बाइक पर आगे बैठते हैं और खूब बातें करते हैं ।   ...तो शब्द कर रहे थे बातें...   ...खूब सारी बातें...  पहले तो वह गाना गाते रहे... कान्हा वाला... फिर वन... टू... थ्री... कहना शुरू कर दीं...  घर फिर भी नहीं आया ।   अब शब्द अपने गले में पड़ी दूरबीन से दूर रास्ते को देखने लगे...  एक तरफ से देखते तो रास्ता दूर दिखता था... बहुत दूर...    और दूसरी तरफ से देखते तो बिलकुल पास... एकदम यहीं पर...  और भी न जाने क्या-क्या बातें...  ऐसे ही बाइक गाँव की ओर वाले रास्ते पर मुड गई...  अब चारों रास्ते के दोनों ओर थे खेत...  शब्द शुरू हो गए... ये क्या है... ये क्या है...  पापा बताते जाते...  ये सरसों है...  सरसों क्या होती है...  ...जिसमें से तेल निकलता है... फिर उससे खाना बनता है...  अच्छा ये क्या है...  फिर ये क्या है...  फिर एकदम से...  अच्छा पापा ये स्काई में क्या है...  बादल हैं...  हमें तो प...

खंती मंती

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छोटे शब्द को इधर एक खेल बड़ा अच्छा लगाने लगा है । जब भी वह पापा के पास होते हैं अपने आप ही पापा को लिटाकर उनके घुटनों पर चढ़ जाते हैं । पापा समझ जाते हैं और खन्ती-मन्ती करने लगते हैं ।   पापा शब्द को अपने घुटनों पर लिटाए हुए ऊपर-नीचे करते हैं । साथ ही साथ कुछ गुनगुनाते भी जाते हैं ।  खन्ती मन्ती, खेलु खिलाई कउडी पाई, गंग बहाई  गंगा मइया नि बारू दइ बारू हमने भुज्जीक दइ भुज्जीनि हमइं चबेना दो चबेना हम घसियारक दो घसियारनि हमका घास दइ घास हमने गउवइ खबाई गउवा मातानि दूधु दो  दूधकि हमने खीरि पकाई खीरि पूरे घर ने खाई बाबानि खाई दादीनि खाई बुआनि खाई चाचानि खाई अम्मानि खाई पापानि खाई बची बचाई  आरे धरी कंधारे धरी  आई मूस  लइ गइ घूस  बुढ्ढा - बुढिययु हटउ पुरानी दिवार खसी  नइ दिवार उठी  हमारो लल्ला कित्तो ऊंचो  इत्तोsssssss ऊंssssचो....  शब्द को यह गीत बहुत अच्छा लगता है । शब्द पापा से ऐसा करने और गाने के लिए बार-बार जिद करता है । खासकर जब पापा उसको पैरों से खूब ऊंचे पर उठाते हैं...  शब्द खूब खिलखिलाकर हँसता है।  स...

इस घर में आप भी रहोगे न पापा

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एक दिन की बात है । तब शब्द स्कूल नहीं जाया करते थे लेकिन पापा रोज स्कूल जाते थे । एक दिन पापा जब स्कूल से वापस आए तो देखा शब्द ने कुछ बनाया है । बेड के चार गद्दों, तकियों से ।   एक मेज को खड़ी करके उसके इधर-उधर से गद्दे लगाए गए थे । एक ओर अपनी साइकिल ‘इबनेबतूता’ को भी खड़ी कर लिया था । उसके अंदर शब्द ने मम्मा के किचन से कुछ बर्तन भी रख लिए थे । साथ ही अपनी कुर्सी और मेज भी ।  शब्द के इस क्रियेशन को देख पापा मुस्कुराए ।  उन्होंने चेयर पर बैठ अपने जूते निकालते हुए पूछा – ये क्या बना है शब्द...  ‘घर बनाया है...’ – शब्द तपाक से बोल पड़े ।  ‘इस घर में आप भी रहोगे न पापा...’ शब्द पापा से मनुहार करते हुए बोले ।  पापा ने खुश होकर कहा – ‘हाँ क्यों नहीं ! मैं तो जरूर रहूँगा इसमें...’  फिर क्या था । पापा, मम्मा को साथ लेकर जा पहुंचे शब्द के इस घर में...   शब्द बहुत खुश हुए । वह बताने लगे –  ‘ये आपका बेडरूम है... यहाँ हम सब लेटेंगे...  इस कमरे में आप अपनी किताबें और कंप्यूटर रख लेना... ये मम्मा का किचन है... इसमें हम खाना बनाएंगे....

ये खिलौने बाजार में नहीं मिलते

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शब्द फाइव इयर का हो गया है । वह अपने मम्मी-पापा के साथ शहर में रहता है । वहीं एक स्कूल में पढ़ता भी है । यहाँ उसके कई अच्छे दोस्त बन गए हैं । अक्षत भइया, गोंटू, नमो भइया, वीर तो शब्द के मोहल्ले में ही रहते हैं ।   ...इसके अलावा मायरा, नियति, आराध्या, राज, शुभ, अनुष्का, दानिश और इसनेहा मैम उसके स्कूल के बेस्ट फ्रेंड हैं ।  शब्द इन सबके साथ खूब खेलता है ।  स्कूल के फ्रेन्डों के साथ वह स्कूल में मैम के सामने खेलता है । झूला झूलना, पेंसिल से खेलना, पकड़म-पकड़ाई... कभी-कभी वह इन दोस्तों के साथ अपनी वैन में भी खेलता है...  ...लेकिन शब्द का असली खेल तो मोहल्ले वाले दोस्तों के साथ होता है । इन सबके पास खूब सारे खिलौने हैं । वह सब टीवी के कार्टून वाले खेल खेलते हैं...   शब्द के पास खूब सारी गेंदें हैं... सब उसके साथ गेंदों से खेलते हैं... गोंटू के पास कई सारे टैड़ी हैं... सब उसके साथ टैड़ी से खेलते हैं...  वीर के पास बहुत बढ़िया साइकिल है... सबने अपने पापा से साइकिल मंगाईं... अब सब साइकिल से भी खेलते हैं...  नमो भइया के पास एक बंदूक है । उसमें से कई तरह की ...

सबीहा आंटी वाली कहानी

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शब्द रोज वाली जिद फिर करने लगे । पापा के गले में गोफा डाले हुए कहानी सुनाने की मनुहार... काफी देर पोटने-पाटने पर पापा तैयार हुए... ...और शब्द को टालने के प्रयास से लगे वही पुरानी कहानी सुनाने...  ‘...बहुत दिनों की बात है...’ शब्द समझ गए कुछ-कुछ, लेकिन अभी चुप रहे... ‘...एक गाँव में एक राजा और एक रानी रहते थे...’ अब शब्द से न रहा गया । पापा की गोद में चढ़ते हुए उनके लिप्स पर फिंगर रख दी ।  ‘...अब नहीं... बिलकुल नहीं... ये वाली कहानी बिलकुल नहीं सुननी है... ...एक राजा वाली नहीं सुनाना... ...एक रानी वाली भी नहीं सुनाना...’  ‘...फिर कौन-सी सुनाऊँ... ’ पापा थोड़ा झुँझलाते हुए बोले ।  ‘...कोई भी सुना दो... आपको तो बहुत सारी कहानियाँ आती हैं... इतनी सारी किताबें पढ़ते हो... कोई भी सुना दो भाई मेरे...  ...मून वाली... ...टाइगर वाली... ...जंगल वाली...  ...साइकिल वाली...  ...सन वाली...’  पापा सोचने लगते हैं ।  ‘...कौन-सी सुनाऊँ... कौन सी सुनाऊँ...’ शब्द : अच्छा वो वाली सुना दो... पापा : कौन वाली...  शब्द : सबीहा वाली... जो आंटी बम में फ्लावर लगाती थीं...

शब्द का गाना

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घर में सब लोगों की महफ़िल जमी थी । सब अंत्याक्षरी खेल रहे थे । सभी बहुत ही बेसुरा गा रहे थे । सबको देखकर शब्द को भी जोश आ गया ।  ‘...मैं भी दाना दाउंदा...’ ‘...तो दाओ न...’ मम्मा बोलीं ।  ...और शब्द गाने लगे... टी वी वाला गाना...  ‘...कान्हा छू जा जरा...  ...कान्हा छू जा जरा... ...बंसी बजइया... ...नंदलाला कन्हइया...  ...पर्वत उठइया... ...मक्खन खबइया... ...होमवर्क करइया...  ...राक्षस भगइया...  ...फ्रेंड के साथ खिलइया...  ...सबकी हेल्प करइया...’     जग गाना रबड़ की तरह खिचने लगा तो सबको आ गई हंसी...  ...सब हँस पड़े तो शब्द गए रूठ...   ...अब रूठ गए तो सब उन्हें लगे मनाने...  और जब मनाने में लग गए तो अंत्याक्षरी हो गई खतम ।    सुनील मानव

सेंटा के खिलौने

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एक दिन की बात है । शब्द सोकर उठे तो उनके पास एक गिफ्ट रखा था । शब्द को पता था – ‘इस रात सेन्टा आने वाला है ।’ इसनेहा मैम ने उसे पहले ही कहानी सुनाई थी । गिफ्ट देखकर शब्द बहुत खुश हो गए । जल्दी से पैकेट खोला... अरे यह क्या !   ... शब्द की सभी फ़ेबरेट चीजें...  एक बड़ी सी वॉल... कई सारी चॉकलेट... जेम्स की बोतल... और भी बहुत सारी चीजें...  शब्द सर पकड़कर बैठ गया...  बोला – लगता है पागल ही हो जाऊंगा...  खुशी सम्हाले नहीं सम्हाल रही थी...  पापा से बोला – सेन्टा के पास इतने खिलौने आते कहाँ से हैं...  पापा - उसके पास एक मैजिक बैग होता है... उसी में होते हैं...  शब्द - मेरे पास क्यों नहीं है मैजिक बैग...  पापा - आप जब बड़े हो जाओगे तब आपके पास भी आ जाएगा...  शब्द - आप तो बड़े हो... आपके पास क्यों नहीं हैं... अब पापा क्या करें । लगे एक झूठ-मूठ की कहानी सुनाने...  ‘... सेन्टा के पास एक रथ होता है... उसमें हार्स होते हैं... उनके पंख होते हैं... वह आसमान में उड़ता है...’  ‘...हार्स के पंख कैसे होते हैं... वह तो सड़क पर चलता है......

दादी को इंग्लिश कहां आती है

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आज शब्द की बेस्ट फ्रेंड मायरा स्कूल नहीं आई ।  उसने मैम से पूछ – मैम मायरा क्यों नहीं आई स्कूल...  ‘...उसके दांत में पेन है...’ – मैम ने शब्द के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे बताया । साथ ही शब्द के साथ आज अब्दुल को बिठा दिया ।  शब्द ये सब बातें अपने पापा को फोन पर बता रहा था ।   शब्द को अब्दुल बिलकुल पसंद नहीं है । वह पूरे टाइम रोता ही रहता है ।  मायरा उसे बहुत पसंद है । वह पूरे टाइम हँसती ही रहती है ।  वह मिलकर खेलते हैं । एक सीट पर बैठते हैं और एक साथ ही खाना खाते हैं । वह दोनों ही अपने टिफिन का खाना आपस में बांटकर खाते हैं ।  आज मायरा के न आने से शब्द उदास होकर बैठ गया । उसका मन न खेलने में लग रहा था और न ही पढ़ने में । खाने में तो बिलकुल ही नहीं ।  मैम ने यह देख लिया ।  मैम शब्द को खूब पसंद करती थीं । उन्होंने शब्द को खुश करने के लिए उसके सिर पर क्राउन लगा दिया और सभी बच्चों से कहा – ‘...देखो आज शब्द किंग बना है...’  इस पर शब्द बहुत खुश हुए ।  घर आते ही सारी बातें पापा को फोन पर बता डालीं ।  शाम को जब पापा घर आए तो उन्होंने अपनी ...

सुई लगा दूंगा

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शब्द के बाबा डॉक्टर हैं । शब्द उन्हें रोज ही लोगों को दवाई देते देखते हैं । जब बाबा दुकान पर चले जाते हैं तब वह उनकी सीट पर जाकर बैठ जाता है और उनकी नकल करने लगता है ।  पहले वह बाबा का चश्मा अपनी आँखों पर लगाता है । फिर आला गले में डालता है । इसके बाद एक कॉपी पर कुछ लिखने लगता है । सब लोग उसे देखते रहते हैं ।   फिर कुछ मरीज़ आ जाते हैं । दादी... बुआ आदि...    दादी – डॉक्टर साहब मुझे बुखार है...  बुआ – डॉक्टर साहब मुझे खांसी आ रही है...  शब्द – अच्छा...   ...फिर शब्द दोनों मरीजों को पहले आला लगाकर देखते हैं ...  बारी-बारी से सभी मरीजों की नब्ज़ देखते हैं ...  इसके बाद कागज की दवाई देते हैं और कहते हैं – गुनगुने पानी से खाना ...  फिर जब मरीज पैसों के लिए पूछते हैं तो वह उनसे कागज के ही पैसे लेकर भाग जाते हैं ।   बाबा जब दुकान से वापस घर आते हैं तो शब्द उनकी दवाइयों वाला झोला चारपाई पर उलट देते हैं और उसमें से उनका आला निकालकर अपने कान में लगा लेते हैं । इसके बाद फिर से शुरू हो जाता है घर के सभी लोगों का चेकअप । ऐसा क...

शब्द के नखरे

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पापा को न जाने क्यों लगाने लगा है कि शब्द के नखरे बड़े अजीब होते जा रहे हैं ।  पहले जब पापा घर से बाहर जाते या वापस आते तो बड़े ही लाड़-प्यार से शब्द के गाल चूम लिया करते ।  धीरे-धीरे ये शब्द की आदत में आ गया । पापा कभी भूल जाएं तो शब्द नाराज़ हो जाते हैं ।  आज पापा ऑफिस के काम से घर आने में जरा लेट हो गए । वापस आए तो शब्द के गाल चूमे बगैर नहाने चले गए । नहाकर निकले तो फोन आ गया और उसके बाद लैपटॉप लेकर कुछ काम करने लगे । शब्द पर ध्यान ही नहीं दिया ।   अब जब शब्द को लगा कि पापा उनका गाल नहीं चूमेंगे तो गाल फुलाकर बाहर बैठ गए । मम्मा ने देखा तो पहले उनकी सूरत पर हँसे बगैर फ़ोटो खींच ली । इस पर शब्द थोड़ा और नाराज हो गए ।  आखिरकार मम्मा ने पूछ ही लिया - क्यों नाराज़ हो...   पहले तो कुछ देर बोले नहीं । कुछ मिन्नतें करबाई ।  फिर सर झुकाए हुए ही कहने लगे – पापा बहुत गंदे हो गए हैं ...    मम्मा - क्यों… क्या हुआ…  शब्द - बाहर से आ जाते हैं… नहाने चले जाते हैं… मोबाइल पर लग जाते हैं… लैपटॉप लेकर बैठ जाते हैं लेकिन प्यार ही नहीं कर...

अच्छरो की बाजार

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शब्द के पास खूब सारे रंगों के खूब सारे अच्छर हैं । हिन्दी के और अंग्रेजी के भी । शब्द को ‘अंग्रेजी’ बोलना अच्छा नहीं लगता है ।  वह कहता है – ये अंग्रेजी के नहीं होते हैं... मैम कहती हैं ये इंग्लिश के होते हैं...  पापा हार मान लेते हैं । उसकी प्यारी इसनेहा मैम के आगे उनकी कहाँ चलने वाली !   अच्छरों के रंग और आकार उसे बहुत पसंद हैं । वह उनसे अपने खेलने के लिए खूब सारे खिलौने बना लेता है । कभी छिपकली, कभी चूहा, कभी बंदर, कभी लंबी सूड वाला हाथी ।  कभी वह इन्हीं रंगीन अच्छरों से रेमबो भी बनाता है ।  शब्द पापा का हैपी बड्डे अक्सर मनाता है । इसके लिए वह इन्हीं अच्छरों से खूब सुंदर केक और मिठाई भी बनाता है । पापा को देने के लिए गिफ्ट भी इन्हीं अच्छरों से बनाया जाता है ।  मम्मा के बराबर में शब्द ने कुछ बिस्तरों को मिलाकर अपना एक किचन बनाया है । इस किचन में मम्मा के किचन के कुछ बर्तन भी रख लिए हैं । कुछ चम्मच हैं, एक कढाही है, एक बड़ा चम्मच है । फिर अपने पढ़ने की टेबल को चूल्हा बनाकर वह इन बर्तनों को उस पर चढ़ाता है । इसके बाद उसमें अपने प्यारे रंगीन अच...

शब्द बने वैज्ञानिक

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एक दिन की बात है । पापा अपने एक फ्रेंड से बातें कर रहे थे । शब्द भी वहीं खेल रहे थे । पापा और उनके फ्रेंड गाँव में गोबर से गैस और बिजली बनाने की योजना बना रहे थे । शब्द दोनों की बातें ध्यान से सुन रहे थे । फिर पापा के फ्रेंड चले गए तो शब्द पापा से बिजली बनाने के बारे में पूछने लगे । तब पापा ने बताया –  गाँव में हमारे घर पर जो काऊ, बफेलो हैं । उनका गोबर होता है।  शब्द – गोबर क्या होता है ? पापा – काऊ और बफेलो की पॉटी...   शब्द – पॉटी तो हमारी होती है...  पापा – उनकी भी होती है...   शब्द – तो उसे गोबर क्यों कहते हैं... हमारी पॉटी को गोबर क्यों नहीं कहते हैं...   (पापा चुप ! उनके सिर पर चाँद-तारे नाचने लगे ।) शब्द – अच्छा बताओ... गोबर से बिजली कैसे बनती है...   पापा – गोबर को एक गड्ढे में डाला जाता है... उसमें से गैस निकलती है और बिजली बनती है ।  शब्द ने खूब ध्यान से पापा की बात सुनी ।  फिर दोनों सो गए ।  अगले दिन जब पापा ऑफिस से वापस आए तो देखा कि दरवाजे पर किसी जानवर ने गोबर किया था और शब्द ने उस गोबर पर बि...