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नीला दरवाजा

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दुनिया की आपसदारी की कहानियां  लोककथाएं पूरी दुनिया को आपसदारी में बांधती हैं । अलग–अलग भाषा शब्दों में टंकी हुई संवेदनाओं को, मानव से लेकर मानवेतर भावों को एक धागे में पिरोती हैं ।  एक संवेदना, एक भाव कैसे पूरी दुनिया भर में बिखरा होता है, बड़ी ही सहजता से कह जाती हैं ।  ‘नीला दरवाजा’ एक ऐसी ही किताब है । यहां फिनलैंड, चेक गणराज्य, कोर्सिका (फ्रांस), अफ्रीका, एस्तोनिया, लातिन अमेरिका, नाईजीरिया और युगांडा की आठ लोककथाएं हैं । इनमें से कई पर बेहतरीन फिल्में भी बन चुकी हैं ।  यदि आपने कभी अपने घरों में दादी, नानी आदि से अपने परिवेश की कहानियां सुनी होंगी तो ये कहानियां केवल नामों को छोड़कर उन जैसी ही लगेंगी ।  गर्मियों की छुट्टियों में इससे बेहतरीन क्या कोई किताब हो सकती है आपके पूरे परिवार के लिए ...  जरूर पढ़ें ...  इस किताब पर विस्तृत जानकारी के लिए कमेंट बॉक्स के लिंक पर जा सकते हैं ...  #आओकरेंकिताबोंकीबातें  #किताबें_कुछ_कहना_चाहती_हैं  #बच्चों_को_किताबों_का_उपहार_दें

मगरमच्छों का बसेरा

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जसबीर भुल्लर के शब्दों और अतनु राय के चित्रों से सजी किताब ‘मगरमच्छों का बसेरा’ दो मगरमच्छों की दोस्ती से शुरू होकर, उनके बिछड़ने, एक लंबे संघर्ष और जीवन के उतार चढ़ावों से गुजरते हुए दोनों के वापस मिलने की एक खूबसूरत कथा है ।  56 पेज की किताब को छोटी–छोटी घटनाओं में बांटा गया है । ये घटनाएं कथा को विस्तार देती हुई किताब को उपन्यासिक बना देती हैं ।  मजेदार है । पढ़ी जानी चाहिए ।  #आओकरेंकिताबोंकीबातें  #किताबें_कुछ_कहना_चाहती_हैं  #बच्चों_को_किताबों_का_उपहार_दें

औरत, लेखन और शराब

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पुस्तक हाथ में आते ही पढ़ ली जानी चाहिए, अन्यथा रैक में आपकी रहनुमाई का इंतज़ार करती रहती है । मेरा प्रयास रहता है कि पुस्तक हाथ में आते ही पढ़ ली जाए, बावजूद इसके कई महत्त्वपूर्ण पुस्तकें बिना पढ़े रह जाती हैं और अपनी बारी का वर्षों इंतज़ार करती रहती हैं । एक ऐसी ही पुस्तक है 'औरत, लेखन और शराब' ।  भाई शराफत अली खान की यह पुस्तक वर्ष 2018 में मेरे पास आई । दो-तीन शीर्षक पढ़ भी डाले थे पर पूरी न पढ़ पाई । आज रैक की सफाई करते हुए सामने कूद पड़ी तो सभी काम किनारे कर पढ़ भी डाली ।  शराफत अली खान की यह पुस्तक लेखकों / रचनाकारों की कुछ विशेष आदतों का विश्लेषण करती है, जिससे उक्त लेखकों / रचनाकारों की एक विशेष पहचान बनी । फ्रायड ने कहीं लिखा था कि 'कला दमित वासनाओं से ही अपना स्वरूप विकसित करती है ।' कष्ट, निर्धनता और परेशानी से ही भाव बाहर आते हैं । पैसे के प्रति आकर्षण साहित्य की आत्मा को खोखला कर देता है । प्रेमचंद ने कहा भी है कि 'जिन लोगो को धन-संपत्ति के प्रति आकर्षण है उनके लिए साहित्य में कोई स्थान नहीं है ।' भुवनेश्वर, निराला, प्रेमचंद, मंटो आदि कभी कालजयी लेखन न कर ...

तुम्हारी औकात क्या है पियूष मिश्रा

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तुम्हारी औकात क्या है पीयूष मिश्रा : पीयूष मिश्रा इस किताब को केवल ‘आरंभ है प्रचंड’ गीत की पृष्ठभूमि को समझने के लिए पढ़ना आरंभ किया था, कुछ फिल्मों में उन्हें एक अभिनेता के रूप में देखने से अधिक कोई परिचय नहीं था । किताब क्या उठाई, पागलपन के चरम पर पहुंचता चला गया ।  बहुत कम आत्मकथाएं पूरी ईमानदारी, पूरी सपाटबयानी के साथ लिखी जा रही हैं । इस किताब ने अंदर तक झकझोर दिया । बने-बनाए उत्स तोड़ डाले । ग्वालियर से लेकर मुंबई तक के सफर का संघर्ष किसी भी व्यक्ति को तोड़ के रख सकता है, इस बंदे ने खुद को बचाया । महज बचाया ही नहीं बल्कि खुद को बुना और सँजोया भी ।  आत्मकथाओं में सबसे अधिक फरेब होता है । हमेशा पढ़ने के बाद मुझे लगता रहा । कुछ-एक को छोड़ दिया जाए तो । इस किताब ने उस धारणा को ठेंगा दिखाया । पीयूष मिश्रा ने अपने जीवन के संघर्ष को, अपनी कमियों को, अपनी बत्तमीजियों को, अपने प्रेम को, शराब-सिगरेट की लत को बड़ी ही स्पष्टता के साथ प्रस्तुत किया है ।  मुंबई में स्टारडम पाले हुए स्ट्रगलर्स को अथवा थियेटर कर रहे नौजवानों को अथवा जीवन के किसी भी प्रकार के संघर्ष से जूझ रहे व्यक्ति को ...

हस्ती नहीं मिटती

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सिनेमा के पिचहत्तर वर्ष पूरे होने पर शरद दत्त द्वारा इससे पूर्व में समय-समय पर लिखे गए लेखों का यह संकलन ‘सिने-इतिहास’ के वह सुनहले पन्ने हैं, जिनमें सिनेमा का स्वर्णिम इतिहास उसकी उठा-पटक के साथ पाठकों से रूबरू होता है । सिनेमा के पिचहत्तर वर्षों का सर्वेक्षण करती हुई यह लेखमाला इस पुस्तक में आने से पूर्व सन् 1988 में ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के दो अंकों में प्रकाशित हो चुकी थी । बकौल फ्लैप ‘स्फुट लेखों का संकलन होते हुए भी पुस्तक एक सुनियोजित इतिहास जैसी बन गई है, जिसमें हिंदी सिनेमा के महत्त्वपूर्ण स्तंभों-निर्देशकों, संगीतकारों, गीतकारों, कलाकारों तथा पार्श्वगायकों के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है । हिन्दी सिनेमा के स्वर्णयुग में दिलचस्पी रखने वाले पाठकों के लिए यह एक उपयोगी तथा ज्ञानवर्धक पुस्तक सिद्ध होगी, ऐसा मेरा विश्वास है ।’ शरद दत्त सिनेमा पर गंभीरता से लिखने वाले अपने समय के, मेरी समझ के एकमात्र लेखक ठहरते हैं । आपने सिनेमा को गहराई से परखा और उसकी संगतियों / असंगतियों को बड़े ही संतुलन के साथ अपने शब्दों में प्रस्तुत किया । सिनेमा पर आपके लेखन को पढ़ना सिनेमा की एक...

थियेटर के सरताज पृथ्वीराज

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पृथ्वीराज कपूर का नाम लेते ही एक ऐसी रोबीली तस्वीर मनोमस्तिष्क में उभरती है और विस्तृत होकर शहंशाह अकबर का एक ऐसा व्यक्तित्त्व गढ़ती है कि पूरा भारतीय परिवेश उसमें समाहित हो जाता है । यह पुस्तक इन्हें पृथ्वीराज के अंतरंग योगराज के संस्मरण के रूप में लिखी गई है । लेखक ने पृथ्वीराज के साथ बिताए पलों और संबंधों को बड़ी ही सूक्ष्मता के साथ इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है ।  पृथ्वीराज कपूर लेखक योगराज के पिता के बड़े घनिष्ट मित्र थे । लेखक के अनुसार ‘इस बहुरंगी और आकर्षक व्यक्त्तित्व की चर्चा हमारे घर में बड़े सम्मान से हुआ करती थी ।’  यह अंतरंगता ही इस पुस्तक की आधार्शिला बनी, जहाँ से लेखक योगराज ने पृथ्वीराज को करीब से देखने, समझने का प्रयास आरम्भ किया ।  बकौल फ्लैप ‘यह पुस्तक कलाकार पृथ्वीराज कपूर तथा उनके ताजमहल ‘पृथ्वी थियेटर’ के अंतरंग एवं बहिरंग की दिलचस्प और सच्ची दास्तान है । पारसी और यथार्थवादी थियेटर के सार्थक समन्वय से एक नई एवं प्रासंगिक रंग-दृष्टि की सृष्टि करने वाले उस रंग-पुरुष और उसके नाट्‍य-दल की ज़बर्दस्त जद्दोजहद, हार-जीत, उपलब्धियों और त्रासदियों का आँखों देखा ज...

ऋतु आए ऋतु जाए

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यह पुस्तक हिन्दी फिल्म जगत में फिल्मी संगीत के जन्मदाता कहे जाने वाले व्यक्तित्व अनिल विश्वास की शरद दत्त की जीवन यात्रा है । बकौल फ्लैप ‘उस समय के सुप्रसिद्ध फिल्म-समीक्षक तथा ‘फिल्म इंडिया’ पत्रिका के संस्थापक-संपादक बाबूराव पटेल के शब्दों में, अनिल विश्वास हिंदी फिल्म-संगीत को स्वतंत्र व्यक्तित्व सौंपने वाले पहले संगीत-निर्देशक हैं । उन्होंने फिल्म-संगीत को मराठी नाट्‍य एवं भक्ति-संगीत के सर्वग्रासी प्रभाव से मुक्त किया और शास्त्रीय तथा लोक-संगीत की सहायता से फिल्म-संगीत की एक ऐसी परंपरा को जन्म दिया, जो उनके समकालीन तथा परवर्ती संगीतकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई ।’ सर्वोत्तम लेखन के लिए वर्ष 2002 के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित यह पुस्तक संगीत जगत के पुरोधा और संगीत के भीष्म पितामह कहे जाने वाले एक ऐसे व्यक्ति की जीवन यात्रा है, जिसमें संगीत के साथ-साथ बदलता हुआ ‘दौर’ जीवंत-सा लगने लगता है । शरद दत्त के उत्कृष्ट लेखन ने पुस्तक को ऊँचाई प्रदान की है, वह अत्यंत सराहनीय है ।  साढ़े तीस सौ पृष्ठ की इस पुस्तक को तीन प्रमुख खण्डों में बाँटा गया है । जीवन-यात्रा, संगीत-चि...