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कथा एक कंस की

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बहुत दिनों बाद एक शानदार रंगमंच प्रस्तुति देखने को मिली । स्थान था – ऋद्धिमा ऑडीटोरियम और प्रस्तुति थी – एकलव्य देहरादून की ‘कथा एक कंस की’ ।   शाहजहांपुर से निकलने के बाद बंगाल में कुछ प्रस्तुतियां देखीं । उसके बाद दिल्ली एन एस डी में । बरेली में इतने दिनों से होने के बावजूद भी रंगमंच की यह मेरी पहली प्रस्तुति थी, जो मैंने आज देखी । देहरादून की एकलव्य संस्था, जिसके निर्देशक अखिलेश अलकाज़ी को ‘शाहजहांपुर रंग महोत्सव’ के बाद यहां पर देखना बेहद सुखद अनुभव रहा । उनकी अदाकारी ने नाटक के कथ्य के साथ जो तालमेल बनाया है, वह अद्भुत था । नाटक ने पूरे समय बांधे रखा । यह अच्छे कलाकारों की काबिलियत होती है ।  ‘कथा एक कंस की’ नाटक मनोवैज्ञानिक ढंग का है । पौराणिक मिथकीय पात्रों को आधुनिक मनोविज्ञान की चासनी में साना गया है । एक विशेष प्रकार का मिथ बन चुके पात्र कंस को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में बेहद सुंदरता के साथ व्याख्यायित किया गया है । कहानी कंस के बाल रूप की है जहां पर उसके पिता उसको मजबूत पुरुष बनाना चाहते हैं । कंस के पिता में पुरुषोचित अहंकार है और बालक कंस में स्त्रियोचित करुणा ।...

आजादी मेरा ब्रांड : अनुराधा बेनीवाल

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कुछ किताबें गहराई तक उतरती चली जाती हैं । पढ़े गए को आपकी अनुभूति में उतारती चली जाती हैं । अनुराधा की किताब ‘आजादी मेरा ब्रांड’ ऐसे ही अहसास को मजबूत बनाने वाली किताब है ।  यह एक ‘ट्रैवलॉग’ है । बोलें तो यायावरी को सिनेमा की रील की तरह हमारे सामने बिंबित करने वाला यात्रा वृत्तान्त । भले ही हिन्दी आलोचना के पितामह नामवर जी ने यात्रावृत्तांत लिखने वालों के क्रम में लेखिका अनुराधा बेनीवाल को राहुल सांकृत्यायन, अज्ञेय और निर्मल वर्मा के बाद चौथा स्थान दिया हो लेकिन एक स्त्री लेखन के रूप में यह अपनी तरह का अनूठा ‘ट्रैवलॉग’ है ।  यहाँ स्त्री-विमर्श का बौद्धिक वाग्विलास या कहें कि दिखावटी जुगाली मात्र नहीं है । यहाँ स्त्री की आजादी का सहज, सरल और जीवंत सा जिया और भोगा हुआ जीवन है ।  लेखिका अकेली निकलती है और यूरोप के एक के बाद एक शहर को घूमती चली जाती है । यूं कहें कि पूरी दुनिया खुद ब खुद चली आती है उसके बेचैन पैरों के तले । उसकी निर्भीक और स्वच्छंद उड़ान को और अधिक गति देने के लिए । वह अपनी हिम्मत के बल पर दुनिया को अपने पैरों तले ले आती है । इस पूरी यात...

मुस्कुराते रहो, गम भुलाते रहो ।

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मुसकुराते रहो, गम भुलाते रहो मुझे फूलों का मुस्कुराना, लहराते हुए फूलों की मदहोशी में खो जाना हमेशा से अच्छा लगता रहा है । बावजूद इसके मुझे गुलाब जैसे फूल कभी नहीं भाए । हालांकि गुलाब की अलग-अलग अवस्थाओं के मैंने बहुत सारे फोटो खींचे । एक ही गुलाब के कली निकलने से लेकर मुरझा कर गिर जाने तक की अनेकानेक अवस्थाओं के फ़ोटो मैंने लिए, लेकिन पता नहीं ऐसा क्या रहा कि सामंत वर्ग के सिर का ताज रहा यह गुलाब, धार्मिक आस्था का सिरमौर रहा यह गुलाब मेरे मन को कभी नहीं भाया । हो सकता है कि मैं अपने साहित्यिक पुरखे ‘निराला’ से प्रभावित रहा होऊँ, लेकिन वैसी ताकत खुद में न भर पाया कि गर्व से सीना फुलाकर कह सकूँ – ‘अबे ! सुन बी गुलाब ।’ ... और ऐसी स्थित में तो बिलकुल ही नहीं जबकि देश की राजनीति अपने सीने पर इस फूल को सजाए हुए हो । ये निराला जी की ‘बिल पावर’ थी । मेरी ऐसी औकात नहीं है । और यदि यदा-कदा मन में ऐसा विचार आ भी जाए कि राजनीति के सिरमौर की सामंती मोहब्बत पर कुछ कहने की सोचूँ भी तो भए से मन कांप उठता है ।  इसलिए भी मेरी मोहब्बत ज़मीन के फूलों के साथ अधिक है । मेरे मन में हमेशा जमीन से जुड़े फू...

शब्द के हजारों प्रश्न

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#ढाई_साल_के_बच्चे_के_हजारों_प्रश्न (दो साल पहले लिखी गई पोस्ट) ‘शब्द’ ढाई साल से ऊपर के हो रहे हैं । इधर उनके प्र्श्नों की सूची लम्बी ही नहीं बहुत लम्बी होती जा रही है । दिन भर में हजारों प्रश्न । ऐसी लगता है जैसे प्रश्नों का कोई झरना है उसके अंदर, जो सतत प्रवाही है । झरता ही रहता है । लगातार । सीमा के साथ किचन में बैठकर खाना बनाने में मदद करना ‘शब्द’ का प्रिय शगल है इस समय । समझा ही जा सकता है कि क्या मदद करते होंगे ! किचन में रखे तमाम डिब्बों, बर्तनों तथा अन्य चीजों के प्रति जिज्ञासा भरे प्रश्न कई बार सीमा का दिमाग खराब कर देते हैं ।  मम्मा यह क्या है ?, क्या ... ?, ये क्या है ? डिब्बा ? चौंककर कहता है । ‘अरे वाह ! ये डिब्बा है मम्मा !’ इसमें क्या है ?, फ़िर ये क्या है ? एक ही वस्तु पर हजारों प्रश्न । तब तक किए जाते रहते हैं जब तक सीमा झल्ला न उठें । क्या यह झल्लाहट ठीक है ? हमारे साथ बाहर घूमने वक्त फ़िर से हजारों प्रश्न । ये क्या है ? ‘फ़्लावर हैं ।’ अरे वाह फ़्लावर हैं । ये किस कलर का है । ‘येलो है ।’ येलो है । लॉन में लगे सैकडों येलो फ़ूलों पर एक-एक कर उँगली रखकर बार-बार पूछते हैं...

एक था मोहन

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https://youtu.be/v6819u3uQME भारतीय समाज में गांधी एक ऐसा व्यक्तित्त्व रहे हैं जिन्होंने साहित्य, समाज, इतिहास, विज्ञान, राजनीति आदि सभी विषयों को प्रभावित किया है । आइंस्टाइन ने तो यहाँ तक कहा था कि “आने वाली पीढियों को आश्चर्य होगा कि एक हाड मास के व्यक्ति ने ब्रिटिश उपनिवेश की जडें बिना हिंसा के हिला दीं ।’’ लेकिन भारत में लार्ड माउंटबेटन के बिछाए जाल में फंसे हमारे युवा गांधी को न पहचान सके । हमारे युवाओं के दिल में गांधी के अथान पर गोडसे ने स्थान बना लिया ।  आज हमारे स्कूलों के बच्चे / किशोर भी गांधी को हिकारत भरी नज़रों से देखते हुए मैंने देखा है । इसका एक कारण वे अनपढ़ शिक्षक हैं जो बिना पुस्तकें पढे हुए बच्चों को ज्ञान की घुट्टी पिला रहे हैं ।  ऐसे विषाक्त दौर में यदि आप किशोरों में गांधी को बचाना चाहते हैं तो “एक था मोहन” पुस्तक आपके और उन किशोर बच्चों के लिए महत्त्वपूर्ण पुस्तक है । पुस्तक में बडी ही सहजता से गांधी जी के जीवन और दर्शन को प्रस्तुत किया गया है । उनके संघर्ष को सरल शब्दों में पिरोया गया है ।  आज के मशीनी युग में गांधी दर्शन एक ऐसी औषधि मुझे लगी जो आ...

अखबारों ने

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दो बहनों की मसाई मारा यात्रा

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दो बहनों की ‘मसाई मारा’ यात्रा  मसाई मारा एक यात्रा है, जहां दो बहनें अकेली गई थीं । कमला भसीन और बीना काक । अब दो हैं तो अकेली कैसे ? यह तो हम पुरुषों का सोचना भर है । खैर ! किताब में एक यात्रा है । यात्रा में है एक जीवन और जीवन की खूब सारी बातें । खूब सारा रोमांच है । ... और इस रोमांच के बीच है केन्या का जंगल । जंगल में एक जगह है । जगह का नाम है – मसाई मारा । ‘मसाई’ वहाँ रहने वाले लोग और वहाँ के शब्दों में ‘मारा’ कहते हैं ‘चितकबरे’ को ।   कमला जी लिखती हैं – ‘यहाँ सैकड़ों किलोमीटर तक घास के मैदान फैले रहते हैं । बीच-बीच में कुछ पेड़ और झाड़ियाँ हैं । दिन भर बादलों की छाया इस इलाके को चितकबरा बनाए रखती है ।’ बस यही इसका भूगोल है ।  दो बहनों की यह यात्रा शुरू हुई थी 15 जुलाई 2017 को । जहां से इन्होंने हमारे लिए बहुत कुछ बटोरा । जैसे हम आंधी आने पर बटोर लाते थे बगिया से खूब सारे टपके हुए आम ।  कमला भसीन लिखती हैं – ‘सात दिन में बीना ने तकरीबन 7000 फ़ोटो खींची । मैंने तकरीबन 7000 शब्द लिखे । और यह किताब बन गई ।’  सही मायनों में यह केवल किताब भर नहीं हैं । दो बहनो...