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गांव का सूनापन

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।। 01 ।। एक अजीब सी संवादहीनता है गांव में । कहीं सामूहिक हुई मौतों से उत्पन्न भयाक्रांत सन्नाटा । यह शून्यता वर्षों पहले महसूस हुई थी, जब गांव में एक बीमारी के चलते कई मौतें हुई थीं । बचपने में वह विस्मृत हो गईं । आज गांव के सूनेपन ने उस समय की याद दिला दी ।   गोरू घर नहीं लौट रहे हैं । बचे ही नहीं । आसमान में एकाध पखेरू भर हैं वापस जाने भर को । वापस आने के लिए इंतजार का कोई आलंबन भी तो होना चाहिए । सब कुछ शांत है । सही कहा ‘वापस आना बड़ा मुश्किल है ।’ पांच–सात घंटे हुए हैं गांव आए हुए । सोने के अलावा बापू के साथ कुछ देर उनकी दुकान पर जा बैठा । एक अजीब सी उदासी है उनकी आंखों में । पूरे जीवन की जिम्मेवारियों के बाद के अलगाव से उत्पन्न चिंगारियों सी ।  अभी कुछ एक लोग निकले हैं मोटरसाइकिल से । एकदम मेरे सामने से । पड़ोस के गांव से लौटे रहे हैं शराब पीकर । मुझे इनके इस नशे का आलंबन दिखाई दे रहा है खामोश उदासी के बीच । एक साइकिल सवार भी निकला है सामने से । चुपचाप अपनी राह पर । मेरी धड़कने तेज़ हो उठी हैं । रक्तचाप अपनी गति बदल रहा है । कोई संवाद नहीं । जैसे कोई जानता ही न हो ...

हिंदी दिवस 2022, आज के अखबार में

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जो बीत गईं वह बातें, संबल भरतीं जीवन में …

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क्या बला का खूबसूरत था स्नातक से लेकर शोध तक का समय । एक अलग ही जुनून हुआ करता था पढ़ने का । नहाना, खाना, जीवन की दिनचर्या जैसे शब्दों का कोई महत्त्व ही न हुआ करता था । जितना पढ़ता जाता, अज्ञानता का दायरा उतना ही बढ़ता जाता । लेकिन क्या ही गज़ब का जुनून हुआ करता था । अध्यापकों और साथी लड़कियों के मन में बसने का लालच । विद्वान बनने की अति महत्त्वाकांक्षा । साथियों के बीच श्रेष्ठता का दंभ । बहुत कुछ दिखावटी सा हुआ होगा, आज दिखता है । बावजूद इसके पढ़ने लिखने की ललक मज़बूत से मज़बूत होती गई । स्नातक से लेकर आगे तक, सिलेबस तो कभी पढ़ा ही नहीं । बस उससे जुड़ी सैकडों किताबें चाटता रहता । बाबा कहते "असल पढ़ाई तो सिलेबस के बाहर की ही होती है ।" … और जब पढ़ने में मन न लगता या कुछ समझ में न आता तो बापू समझाते "किताब को आँखों के सामने से हटने न दो, कितनी देर समझ में न आएगी । पढ़ते जाओ, बस पढ़ते ही जाओ ।" साथी ही अलग-अलग प्रकार की किताबें सुझाते । … आगे चलकर अरशद और साजिद सर ने तो जैसे भूचाल ही ला दिया जीवन में । वो मेरे जीवन के आदर्श बनकर आए । लेखन के साथ जीने वाले इन दोनों आदर्शों ने किताबो...

चोरी और पिटाई बनाम कुंडल चोरी का आरोप …

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मैं अपनी पीढ़ी का पहला जीवित बच्चा था अपने परिवार का । ऊपर से लड़का । घर के लोगों का कहना था कि मुझसे पहले एक-दो बच्चे मर चुके थे, और मैं बड़ी मिन्नतों बाद बचा था । कर्मकाण्डी ब्राह्मण परिवार द्वारा जितने जतन हो सकते थे बचाने के, सब किए गए थे । तुलादान से लेकर जन्मते ही दलित दादी के हाथों बिक्री तक । जन्मदिन भी नहीं मनाया गया कभी । घर के लोगों का मानना था कि मुझसे पहले के लड़के का मनाया गया था, वह न रहा । इसलिए मेरा जन्मदिन नहीं मनाया गया । बावजूद इसके मुझे अत्यधिक लाड़, प्यार, स्नेह, अधिकार और छूटें मिलीं जो पुरुष प्रधान परिवारों में ‘लड़कों’ को आज भी मिलती हैं ।  जिया-बाबा से लेकर अम्मा-बापू, चाचा-चाची, बुआ और अन्य सभी । कारण एकमात्र मेरा लड़का होना था, क्योंकि बाद में घर में जो लड़की पैदा हुई वह उन अधिकारों और छूटों से, लाड़, प्यार और स्नेह से वंचित रही । यदि मेरी पीढ़ी में मुझे छोड़ दिया जाए तो मेरे तथाकथित ब्राह्मण परिवार में यह स्थिति अब तक बनी ही हुई है । आज चौथी पीढ़ी के लड़का और लड़की में ‘दूरी’ को स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है । खैर ! यह तो बड़ी रामकथा है । कभी न खत्म होने वाली । वास्तव...

#आ_जा_रे_कन्हैया_तोहे_राधा_बना_दूँ

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रामानन्द सागर के धारावाहिक ‘श्री कृष्णा’ में एक दृश्य देखा था कभी । दृश्य था कि कृष्ण और राधा यमुना किनारे बैठे हुए प्रेमालाप कर रहे हैं । उनमें बातचीत हो रही है ।  कृष्ण : राधा उस दिन होली पर तुम वहाँ से चली क्यों गई थीं ...  राधा : तुम इतना बरजोरी जो कर रहे थे ...  कृष्ण : बरजोरी ! ... मैं ... मैं तो केवल रंग लगा रहा था तुम्हें ... राधा : तुम सभी मर्यादा भूल जाते हो कान्हा ... कितने लोग थे वहाँ ...  कृष्ण : तो क्या हुआ ... प्रेम में काहे की मर्यादा ... मेरा मन किया तो मैं रंग लगाने लगा ... इसमें मर्यादा हीनता की कौन सी बात है ...  राधा : काश ! तुम राधा होते ...  कृष्ण : अच्छा ! तो क्या होता ...  राधा : तो तुम समझ पाते कि ‘राधा होना’ कितना मुश्किल होता है ...  कृष्ण : मुझे तो इसमें कोई मुश्किल नहीं लगती राधा ... राधा : क्योंकि तुम राधा नहीं हो ना  कृष्ण : तो बन जाता हूँ मैं राधा ...  राधा : (राधा हँसती है) ... तुम राधा बनोगे !  कृष्ण : तो ... इसमें हंसने की क्या बात है ... मैं राधा बन जाता हूँ और तुम कृष्ण बन जाओ ... राधा : कैसे .....

सवर्णेतर जातियों का ‘ब्राह्मणवाद’ : सुनील मानव

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आज बुद्धिजीवियों द्वारा सबसे अधिक चर्चा ‘जातियों’ को तोड़ने, उनसे मुक्ति पाने को लेकर की जाती है बावजूद इसके उन्हीं द्वारा इन ‘जातियों’ का सबसे अधिक पोषण भी किया जा रहा है । सवर्ण से लेकर दलित तक सब अपने-अपने ढंग से दूसरे की ‘जाति’ को गालियाँ देते हुए अपनी-अपनी ‘जातियों’ के इतिहास को खंगाल रहे हैं, लिख रहे हैं और प्रत्येक स्तर पर उसको मज़बूत बनाने के लिए कार्य कर रहे हैं । तब यह झूठा वितंडावाद किस लिए कि जाति नहीं होनी चाहिए !  अभी पिछले दिनों हमारे एक मित्र का एक लिखित संदेश आया और उस पर मेरी राय मांगी । तो पहले उनका यह संदेश देख लेना चाहिए । यह संदेश एक संवाद के रूप में है जो हमारे एक मित्र और दलित चिंतक के मध्य हुआ । बाद में मैं भी उसमें सम्मिलित हुआ । “मेरे मित्र : सर नमस्कार ! आज फेसबुक पर आपका भी ‘जय भीम’ का अभिवादन पढ़ा । मैं इस अभिवादन या नारे के मनोविज्ञान को बहुत नहीं जानता । कब, किसने और क्यों शुरू किया ? लेकिन जानना चाहता हूँ । क्या यह ‘जय श्री राम’ के विरोध में शुरू किया गया है या कोई और कारण है ? दूसरे मैंने सामान्यत: किसी बड़े बुद्धिजीवी या साहित्यकार के म...

जी लूं वह जो रहा उधार

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#जी_लूं_वह_जो_रहा_उधार मन करता है इस बचपन को पा लूं फिर से उड़ जाऊं बिन पंखों के ही पंक्षी का अहसास साथ ले खेलूं गाऊं कूद-कूद जाऊं मैं  इस बचपन की बनूँ इबादत छोटे-छोटे बिंबो पर  लिखूं अमिट शब्दावलियाँ मैं मन करता है इस बचपन को पाकर फिर से  जी लूं वह जो रहा उधार . . .  सुनील मानव 15.08.2016