भक्तिकाव्य के विरल कवि ‘नंददास’
भक्तिकाव्य के विरल कवि ‘नंददास’ Ø सुनील ‘मानव’ भारत में कृष्णभक्ति की परंपरा भागवत धर्म के रूप में अति पुरातन काल से मौजूद रही है। लेकिन कालांतर में इस परंपरा में कर्मकांडों का प्रभाव बढ़ जाने से भागवत धर्म की मूल प्रवृत्ति समाप्त प्राय हो गई। ऐसी परिस्थिति में उत्तर भारत में जहां जैन और बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ने लगा वहीं दक्षिण में यह स्थान आलवरों ने लिया। इन बाद में विकसित हुए धर्मों में जैन धर्म जहां कर्मकांडी जकड़ के चलते एक सम्प्रदाय में सिमट गया वहीं बौद्ध धर्म ने राजाश्रय से भारत ही नहीं भारतेतर स्थानों पर भी अपना परचम लहराया। जैन धर्म की कर्मकांडता ने आगे चलकर महायान, हीनयान, सहजयान आदि धर्म की जटिल परंपराओं को जन्म दिया, जिसके चलते समाज में नाथों, सिद्धों, कापालिको, योगियों आदि का प्रादुर्भाव हुआ। इन्होंने धर्म की स्वतंत्र व्याख्या करके उसको दूसरी दिशा में मोड़ने का प्रयास किया। ऐसी सामाजिक और धार्मिक क्रियाओं के समक्ष शंकराचार्य ने‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ की घोषणा करके वैदिक चिंतन धारा को एक नवीन गति प्रदान की। शंकर की इस चिंतन प्रक्रिया को ‘अद्वैतवाद’ के नाम से...