जो बीत गईं वह बातें, संबल भरतीं जीवन में …

क्या बला का खूबसूरत था स्नातक से लेकर शोध तक का समय । एक अलग ही जुनून हुआ करता था पढ़ने का । नहाना, खाना, जीवन की दिनचर्या जैसे शब्दों का कोई महत्त्व ही न हुआ करता था । जितना पढ़ता जाता, अज्ञानता का दायरा उतना ही बढ़ता जाता । लेकिन क्या ही गज़ब का जुनून हुआ करता था । अध्यापकों और साथी लड़कियों के मन में बसने का लालच । विद्वान बनने की अति महत्त्वाकांक्षा । साथियों के बीच श्रेष्ठता का दंभ । बहुत कुछ दिखावटी सा हुआ होगा, आज दिखता है । बावजूद इसके पढ़ने लिखने की ललक मज़बूत से मज़बूत होती गई । स्नातक से लेकर आगे तक, सिलेबस तो कभी पढ़ा ही नहीं । बस उससे जुड़ी सैकडों किताबें चाटता रहता । बाबा कहते "असल पढ़ाई तो सिलेबस के बाहर की ही होती है ।" … और जब पढ़ने में मन न लगता या कुछ समझ में न आता तो बापू समझाते "किताब को आँखों के सामने से हटने न दो, कितनी देर समझ में न आएगी । पढ़ते जाओ, बस पढ़ते ही जाओ ।" साथी ही अलग-अलग प्रकार की किताबें सुझाते । … आगे चलकर अरशद और साजिद सर ने तो जैसे भूचाल ही ला दिया जीवन में । वो मेरे जीवन के आदर्श बनकर आए । लेखन के साथ जीने वाले इन दोनों आदर्शों ने किताबो...