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Showing posts from 2016

एक बच्चे के प्रति ...

वह खड़ा था सेतु पर किशोरावस्था की बचपन से अछूता नहीं था बस बढ़ रहा था धीरे-धीरे माँ-बाप से अलग छात्रावास में रहते हुए अध्यापक ही थे उसके अभिवावक उसको ऐसा ही बताया गया थ...

प्रसिद्ध कथाकार हृदयेश जी से कुछ गुप्तगू

सुनील ‘मानव’ : कहानी में राजनीति की कहाँ तक गुंजाइश है? क्या यह कहानी के लिए घातक है? हृदयेश : देखिये राजनीति में तो बहुत सी विचारधारायें हैं। जहाँ तक कि एक विचारतत्त्व की ब...

नीलगाय पर तीन कविताएँ

नीलगाय बचपन में पहली बार सुना था उसके बारे में सुना था कि जंगली होती हैं वह गाय भी और जंगली भी एक साथ दोनों यह एक स्वप्न था सच्चाई उन्हें जंगली अधिक घोषित करती है यह मांसाहा...

मकसूद मियां : सुनील मानव

ईशा की नमाज़ पढ़कर मकसूद मियां बाहर आए तो बाजपेई जी बरोठे में ही बैठे मिले। बोले – ‘चतुर्वेदी जी नमाज़ पढ़नी तो छोड़नी पड़ेगी . . . ’ मकसूद मियां के पोपले गालों पर चमक आ गई – ‘मियां बा...